पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार ने IIT IIM and AIIMS जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों की संख्या में तेज़ी से इज़ाफ़ा किया है। इसका मुख्य उद्देश्य देश के अलग-अलग राज्यों में उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित करना है। छोटे शहरों और पिछड़े इलाकों में नए संस्थान खुलने से स्थानीय छात्रों को बड़े महानगरों में जाने की मजबूरी कम हुई है।
बढ़ती संख्या बनाम गुणवत्ता पर उठते सवाल

हालांकि संस्थानों के विस्तार का स्वागत किया गया, लेकिन गुणवत्ता को लेकर बहस भी तेज़ हुई है। कई नए IIT IIM and AIIMS में अनुभवी प्रोफेसरों की कमी, सीमित रिसर्च सुविधाएं और अस्थायी इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसी समस्याएं सामने आई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इन कमियों को दूर नहीं किया गया, तो इन संस्थानों की प्रतिष्ठा पर असर पड़ सकता है।
फंडिंग और स्वायत्तता को लेकर विवाद

इन संस्थानों के संचालन में फंडिंग एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। बढ़ते खर्चों के मुकाबले बजट आवंटन पर्याप्त नहीं होने की शिकायतें सामने आती रही हैं। साथ ही, शिक्षाविद् अधिक शैक्षणिक और वित्तीय स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं, ताकि रिसर्च, फैकल्टी नियुक्ति और उद्योग सहयोग को बेहतर तरीके से आगे बढ़ाया जा सके।
आगे की राह: संतुलित विकास की जरूरत
🚨 In the last 10 years, India has “added”:
— The Protagonist (@_protagonist1) December 16, 2025
7 IIT tags (without IIT-level faculty)
8 IIM tags (without IIM-level depth)
16 IIITs (PPP, not public excellence)
5 AIIMS (still incomplete)
8 Central Universities (underfunded)
विशेषज्ञों का मानना है कि आगे का रास्ता संतुलित और चरणबद्ध विस्तार का होना चाहिए। नए संस्थानों के साथ-साथ पुराने IIT IIM and AIIMS को भी मजबूत करना ज़रूरी है। पर्याप्त फंडिंग, योग्य फैकल्टी, आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर और पारदर्शी मूल्यांकन प्रणाली से ही यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि भारत की ये संस्थाएं वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाए रखें।









